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Updated: Jan 4, 2019

हिन्दीज्ञान हिन्दी शिक्षण में आधुनिक तकनीकों के प्रयोग का खुलकर समर्थन करता है और इसके लिए हर संभव प्रयास करता है।



मित्रो,

हिन्दीज्ञान वेबसाइट CISCE हिन्दी के पाठ्यक्रम के साथ अपने नए रूप में आप सबके सामने प्रस्तुत है। यह साइट हिन्दी शिक्षकों के साथ-साथ विद्‌यार्थियों के लिए भी लाभकारी है। यहाँ विद्‌यार्थियों को हिन्दी पाठ्यक्रम से संबंधित विभिन्न कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास तथा व्याकरण की जानकारी प्राप्त होती है। परीक्षा को ध्यान में  रखते हुए लेखक-परिचय, कठिन शब्दार्थ, पंक्तियों पर आधारित प्रश्नोतर, विस्तृत उत्तरीय प्रश्न आदि का भी समावेश किया गया है जिसका उपयोग कर विद्‌यार्थी अच्छे अंकों के साथ परीक्षा उत्तीर्ण कर पाने में सक्षम हो रहे हैं। शिक्षको के लिए भी विभिन्न पाठों का विश्लेषणात्मक अध्ययन और उनसे जुड़े कई तरह के प्रश्नों के उत्तर खोजने का भी प्रयास किया जा रहा है। हिन्दीज्ञान हिन्दी शिक्षण में आधुनिक तकनीकों के प्रयोग का खुलकर समर्थन करता है और इसके लिए हर संभव प्रयास करता है।



मेरा मानना है कि हर विद्‌यार्थी में ज्ञान और संवेदना की भावना होती है और  शिक्षकों की यह ज़िम्मेदारी है कि  वह विद्‌यार्थियों को प्रोत्साहित करे। एक विद्‌यार्थी  तभी सफलता प्राप्त कर सकता है जब उसे उचित अवसरों और साधनों के साथ  अभिभावक और शिक्षकों का सहयोग एवं मार्ग-दर्शन प्राप्त होता रहे।
शिक्षण अधिगम प्रक्रिया का उद्‌देश्य कक्षा को जीवंत सामाजिक समुदाय में परिवर्तित करना होना चाहिए जहाँ प्रत्येक विद्‌यार्थी में सकारात्मक सोच, समानता का भाव, लोकतांत्रिक मूल्य और मानवीय दृष्टिकोण का विकास हो सके। जब एक विद्‌यार्थी अपनी शिक्षा पूरी कर, कक्षा से समाज तक की यात्रा शुरू करता है तब उसमें इतनी क्षमता होनी चाहिए कि वह अपने ज्ञान और संवेदना का समुचित उपयोग करते हुए समाज को नए सिरे से गढ़े और उसे ज़्यादा मानवीय बनाए।


शिक्षण कला है और शिक्षक संस्कृत-कर्मी

पिछले पाँच वर्षों से हिन्दी शिक्षण अधिगम प्रक्रिया पर विभिन्न कार्याशालाओं का संचालन करने के उपरांत यह समझ पक्की हुई है कि एक शिक्षक होने के नाते मैं या हम सब जो शिक्षण से जुड़े हुए हैं, अपने विद्‌यार्थियों के लिए रोल मॉडल की तरह हैं। आपकी कक्षा में बैठा हर विद्‌यार्थी आपकी ओर ज्ञान-प्राप्ति की आशा में टकटकी लगाए बैठा है। आपके कहे हुए हर शब्द और वाक्य उसके लिए ब्रह्‌म शब्द हैं जिसकी सच्चाई पर वह पूर्ण विश्वास करता है या करने की कोशिश में लगा रहता है। अत: शिक्षकों का यह परम कर्त्तव्य है कि वे अपनी कक्षाओं को ज्ञान की प्रयोगशाला बनाएँ जहाँ हर उस गतिविधि और प्रयोग की गुंजाइश बनी रहे जो आपके विद्‌यार्थियों के हर तरह के अभाव, अज्ञान और संताप को मुक्त करने में उनका सहयोग कर सके क्योंकि अच्छी शिक्षा के आधार पर ही मानवीय, प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष समाज की परिकल्पना की जा सकेगी।


शिक्षण कला है और शिक्षक एक संस्कृत-कर्मी जिसे सीमित साधनों का प्रयोग करते हुए असीमित संभावनाओं की तलाश करनी है। शिक्षक का काम उस कुम्भकार की तरह है जिसे गीली मिट्‌टी को आकर देना होता है यदि उसने सही आकार दे दिया तो उसे मानसिक और भावनात्मक संतुष्टि की प्राप्ति हो जाती है, अन्यथा वह अपने कर्म में असफल करार दिया जाएगा और जिसकी भरपाई पूरा समाज भी नहीं कर पाएगा।

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